अनुशासन जरूरी है
अनुशासन जरूरी है
जीवन को देखने की कई तरीके हो सकते हैं साथ ही हम जिस भी कार्य को करते हैं या जिस भी कार्य की बात करते हैं ….
उसको करने का….
उसको सोचने का एक नियम होता है जिन नियमों को हम कार्य में संलग्न करके , उससे उस कार्य की गुणवत्ता को और अधिक बढ़ा सकते हैं और इन्हीं नियमों के अभाव में किया गया कार्य उतना व्यवस्थित और उत्कृष्ट परिलक्षित नहीं होता है जितनी की कल्पना किया जाता है, निश्चित बिना विचार किए गए यही वह कार्य है जो कि दिखने में उतने व्यवस्थित दृष्टिगत नहीं होते हैं । जब हम बात अनुशासन की करते हैं तो अनुशासन उस व्यवस्था को दर्शाता है जो की एक निश्चित क्रम में किया गया कार्य है, जिससे कि कार्य पूर्ण होने के साथ उसे गुणवत्ता पूर्ण किया जाना भी निश्चित किया जा सके, साथ ही अनुशासन के साथ किया गया कार्य वह संतुष्टि प्रदान करता है जो की कार्य की प्रशंसा के साथ आत्म संतुष्टि को भी दिखाने वाला है और इसके अभाव में जीवन और कार्य दोनों ही अव्यवस्थित से परिलक्षित होते हैं उदाहरण के लिए हम जब किसी दिनचर्या के संदर्भ में वार्ता करते हैं तो देखते हैं कि दैनिक कार्यों को क्रम और नियमों से करने के बाद कार्य पूर्ण भी हो जाते हैं और हम उससे समय का सदुपयोग भी कर पाते हैं इसके अभाव में बिना योजना के किया गया दिनचर्या का कार्य न तो कार्यों को पूर्ण करने वाला होता है और ना ही ना ही समय के सदुपयोग को दिखाने वाला होता है ….
यह हमारी दिनचर्या का एक छोटा सा उदाहरण है जो की अनुशासन के बारे में हमें परिचित करवाता है साथ ही आप अनुशासन विषय को विभिन्न कार्य और विषयों के संदर्भ में विचार कर सकते हैं । अनुशासन किसी भी कार्य को किस संदर्भ में किया गया एक वह व्यवस्था है जो की कार्य को उस प्रकार पूर्ण करता है जिससे कि उसकी व्यवस्था की गई है ….
जिस प्रकार शरीर के चलने का एक निश्चित क्रम है एक निश्चित अनुशासन है और इसी क्रम और अनुशासन में अव्यवस्था आने पर ना तो शरीर कार्य उचित प्रकार से कर पता है ना ही हम मस्तिष्क को उसे प्रकार के निर्देश दे पाते हैं जो कि समय के अनुसार उचित परिलक्षित हो और यही कार्य अनुशासन भी करता है वह हमें एक उचित दिशा प्रदान करता है किसी भी कार्य को करने के लिए जो कि जीवन के लिए आवश्यक है।