आप जानते हैं क्या करना है… फिर भी करते क्यों नहीं?
आप जानते हैं क्या करना है… फिर भी करते क्यों नहीं?
बहुत से लोग इस सवाल के साथ जी रहे हैं।
उन्हें पता है कि क्या सही है।
उन्हें यह भी पता है कि क्या करना चाहिए।
फिर भी वे वही पुराने काम दोहराते हैं,
वही टालमटोल, वही बहाने, वही अधूरापन।
आइए समझते हैं कि ऐसा क्यों होता है।
1. समस्या जानकारी की नहीं, आंतरिक टकराव की है
अधिकतर लोग सोचते हैं कि
अगर उन्हें और जानकारी मिल जाए,
तो वे एक्शन लेने लगेंगे।
लेकिन सच्चाई यह है कि
ज्ञान और क्रिया के बीच डर खड़ा होता है।
- असफल होने का डर
- जज किए जाने का डर
- गलत साबित हो जाने का डर
जब तक यह डर साफ नहीं होता,
जानना भी आपको आगे नहीं बढ़ाता।
2. आपका दिमाग आपको सुरक्षित रखना चाहता है
मानव मस्तिष्क का पहला काम सफलता नहीं,
सुरक्षा है।
नई आदत, नया कदम, नया निर्णय
दिमाग को खतरा लगता है।
इसलिए वह आपको कहता है—
“कल से करेंगे”
“अभी सही समय नहीं है”
आप इसे आलस समझते हैं,
लेकिन असल में यह सुरक्षा-प्रणाली है।
3. पुरानी पहचान नए एक्शन को रोक देती है
आप कहते हैं—
“मुझे बोलना शुरू करना है”
“मुझे बिज़नेस बढ़ाना है”
लेकिन अंदर से आपकी पहचान अभी भी कहती है—
“मैं ऐसा इंसान नहीं हूँ”
जब तक आप खुद को
नए रूप में देखने नहीं लगते,
आपके कदम अपने आप पीछे खिंचते रहते हैं।
4. आप परिणाम पर ध्यान देते हैं, प्रक्रिया पर नहीं
आप सोचते हैं—
“अगर फेल हो गया तो?”
“अगर रिज़ल्ट नहीं आया तो?”
जब ध्यान सिर्फ परिणाम पर होता है,
तो एक्शन भारी लगने लगता है।
लेकिन जब आप प्रक्रिया पर ध्यान देते हैं,
तो कदम हल्के हो जाते हैं।
5. आप खुद पर भरोसा खो चुके हैं
बार-बार शुरू करके छोड़ देने से
एक बात अंदर बैठ जाती है—
“मैं टिक नहीं पाता”
फिर अगली बार जब आप सोचते हैं,
तो मन ही मन खुद पर शक करने लगते हैं।
यह शक आपको रोक देता है।
समाधान क्या है?
आपको खुद को ज़ोर से धकेलने की ज़रूरत नहीं है।
आपको ज़रूरत है:
- छोटे लेकिन ईमानदार कदमों की
- अपनी पहचान को अपडेट करने की
- डर को समझने की, दबाने की नहीं
- खुद से किया गया वादा निभाने की
जब भरोसा वापस आता है,
तो एक्शन अपने आप शुरू हो जाता है।
याद रखिए—
आपमें कमी नहीं है।
बस आपके अंदर चल रही आवाज़ों को
समझने की ज़रूरत है।
