आप जितना सोचते हैं, उतना जी क्यों नहीं पाते
आप जितना सोचते हैं, उतना जी क्यों नहीं पाते
हम सबके भीतर
एक बेहतर ज़िंदगी की तस्वीर होती है।
हम सोचते हैं—
मैं ऐसा बन सकता हूँ
मैं यह हासिल कर सकता हूँ
मैं इस तरह जी सकता हूँ
फिर भी ज़िंदगी
उस सोच से बहुत छोटी रह जाती है।
क्यों?
1. सोच आगे होती है, साहस पीछे
आपका दिमाग
संभावनाएँ देख लेता है।
लेकिन आपका साहस
अक्सर वहीं रुक जाता है
जहाँ जोखिम शुरू होता है।
सोच सस्ती है।
कदम महंगे होते हैं।
2. आप सपनों से नहीं, डर से फैसले लेते हैं
अधिकतर निर्णय
आपके सपनों से नहीं,
आपके डर से निकलते हैं।
डर आपको
छोटा खेलने पर मजबूर करता है।
और फिर आप वही जीते हैं
जो सुरक्षित है,
जो परिचित है।
3. आप खुद को लगातार सीमित करते हैं
आपके शब्द
आपकी सीमा तय करते हैं।
“मेरे लिए मुश्किल है”
“मैं ऐसा नहीं हूँ”
“मेरे हालात ऐसे हैं”
ये वाक्य
धीरे-धीरे
आपकी सोच को कैद कर लेते हैं।
4. आप भविष्य के लिए वर्तमान कुर्बान नहीं करते
बड़ी ज़िंदगी के लिए
छोटी सुविधाएँ छोड़नी पड़ती हैं।
लेकिन हम
आज की राहत
कल के विकास से ज़्यादा चुनते हैं।
और फिर सोचते हैं
ज़िंदगी आगे क्यों नहीं बढ़ रही।
5. आप अपनी सोच पर भरोसा नहीं करते
आप सोच तो लेते हैं,
लेकिन उस सोच पर
पूरा भरोसा नहीं करते।
थोड़ा सा शक
पूरा कदम रोक देता है।
समाधान क्या है?
आपको और सोचने की ज़रूरत नहीं है।
आपको अपनी सोच के
अनुसार जीने की ज़रूरत है।
छोटे कदम
लेकिन ईमानदार।
वही कदम
धीरे-धीरे
आपकी सोच और ज़िंदगी
दोनों को बराबर कर देंगे।
याद रखिए—
सोच वही सच्ची होती है
जिसे जीने की हिम्मत हो।
